मैथिलीशरण गुप्त जी की पुण्यतिथि पर विशेष ,डबरा में कई सामाजिकसंगठनों द्वारा पुण्यतिथि मनाई गई ।

मैथिलीशरण गुप्त पुण्यतिथि : 'वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे' गुप्त राष्ट्रकवि केवल इसलिए नहीं हुए कि देश की आजादी के पहले राष्ट्रीयता की भावना से लिखते रहे। वह देश के कवि बने क्योंकि वह हमारी चेतना, हमारी बातचीत, हमारे आंदोलनों की भाषा बन गए।  अपने साहित्य अपने काव्य से नीरस मानव जीवन में नव चेतना जागृत करने वाले हजारी प्रसाद द्विवेदी के एकलव्य मैथिलीशरण गुप्त आज ही के दिवस ईश्वर तत्व में विलीन हुए थे। उनका निधन 12 दिसम्बर 1964 में हुआ. लेकिन 1914 में छपी 'भारत-भारती' और 1931 में आई 'साकेत' जैसी रचनाएं आज भी उतनी ही सटीक हैं, जितनी उस समय रही होंगी। गुप्त राष्ट्रकवि केवल इसलिए नहीं हुए कि देश की आजादी के पहले राष्ट्रीयता की भावना से लिखते रहे। वह देश के कवि बने क्योंकि वह हमारी चेतना, हमारी बातचीत, हमारे आंदोलनों की भाषा बन गए। 
 नर हो ना निराश करो मन को........... हरे भरे हैं खेत सुनहरे फल फूल से युक्त वन उपवन, तेरे अंदर भरा हुआ है, खनिजों का व्यपक धन, मुक्त हस्त तू बांट रही है सुख संपति धन धाम, मातृ भूमि शत शत बार प्रणाम,।।।मातृ भूमि के अडिग अखण्ड पुजारी अपने काव्य में शब्दो का नेह उङेलते देखे जा सकते हैं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उन्हें राष्ट्रकवि का सम्मान देते हुए कहा था - मैं तो मैथिलीशरणजी को इसलिए बड़ा मानता हूं कि वे हम लोगों के कवि हैं और राष्ट्रभर की आवश्यकता को समझकर लिखने की कोशिश कर रहे हैं।
साहित्यकार किसी भी देश या समाज का निर्माता होता है। इस मायने में मैथिलीशरण गुप्त ने समाज और देश को वैचारिक पृष्ठभूमि दी, जिसके आधार पर नया दर्शन विकसित हुआ है। उन्होंने शब्द शिल्पी का ही नहीं, बल्कि साहित्यकार कहलाने का गौरव प्राप्त किया है, महात्मा गांधी के भारतीय राजनीतिक जीवन में आने से पूर्व गुप्तजी का युवा मन गरम दल और तत्कालीन क्रांतिकारी विचारधारा से प्रभावित हो चुका था। लेकिन बाद में महात्मा गांधी, राजेन्द्र प्रसाद, जवाहर लाल नेहरू और विनोबा भावे के संपर्क में आने के कारण वह गांधीवाद के व्यावहारिक पक्ष और सुधारवादी आंदोलनों के समर्थक बने। देशभक्ति से भरपूर रचनाएं लिख उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में एक अहम काम किया। वे भारतीय संस्कृति एवं इतिहास के परम भक्त थे। पहला काव्य संग्रह 'रंग में भंग' और उसके बाद 'जयद्रथ वध' प्रकाशित हुआ. 'भारत-भारती' 1914 में आई. यह गुलाम भारत में देशप्रेम और निष्ठा की सर्वश्रेष्ठ कृति थी. इसमें भारत के अतीत और वर्तमान का चित्रण तो था ही, भविष्य की उम्मीद भी थी. भारत के राष्ट्रीय उत्थान में भारत-भारती का योगदान अद्भुत है. 'साकेत' और 'पंचवटी' 1931 में छप कर आए. साकेत में उर्मिला की कहानी के जरिए गुप्त जी ने उस समय की स्त्रियों की दशा का सटीक चित्रण किया. राम, लक्ष्मण और सीता की कहानी तो हम सुनते ही आए थे, लेकिन यह गुप्त जी थे जो उर्मिला के त्याग के दर्द को सामने लाए. 1932 में 'यशोधरा' का प्रकाशन हुआ. यह भी महिलाओं के प्रति उनकी गहरी संवेदना दिखाता है।


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