पुलिस एफ आई आर दर्ज ना करे तो,आमनागरिको को क्या करना चाहिये।
 समझे।पुलिस एफ आई आर दर्ज ना करे तो , आमनागरिको को क्या करना चाहिये। 
सलाह।परिस्थितियां अलग अलग होने पर प्रकरण की स्थिति बदल जाती है, मसलन सार्वजनिक स्थान से गाड़ी चोरी होने पर मामला अलग किस्म का होगा और निजी परिसर या निजी स्थान से गाड़ी चोरी होने पर अलग किस्म का होगा , हर प्रकरण में चोरी की एफ आई आर थाने में होना जरूरी है , चोरी की इत्तला , धारा 379 आई पी सी , संज्ञेय अपराध है , जिसकी एफ आई आर पुलिस को तुरंत सूचना प्राप्त होते ही करना आवश्यक है , पुलिस के लिये किसी भी आवेदन चाहे वह संज्ञेय अपराध हो या चाहे असंज्ञेय , उस आवेदन को तुरंत पुलिस स्टेशन की जनरल डायरी मेंं म प्र पुलिस एक्ट की धारा 634 के तहत एंट्री करना आनिवार्य है , यदि ऐसी एंट्री नहीं की जाती या अशुद्ध एंट्री या त्रुटिपूर्ण एंट्री की जाती है तो उस पुलिस अधिकारी को सेवा से बर्खास्त कर दिया जायेगा , सुप्रीम कोर्ट के आदेश और दिशा निर्देश के अनुसार , पुलिस को प्राप्त हर आवेदन का 15 दिन के भीतर निराकरण हो जाना चाहिये , विशिष्ट अपवाद वाले केसों में आवेदन हर हाल में 42 दिन के अंदर निराकृत हो जाना चाहिये , एस पी को समय समय पर थाने का और जनरल डायरी का निरीक्षण कर यह देखना चाहिये कि कोई आवेदन उसमें एंट्री हुआ है या नहीं, अशुद्ध या त्रुटिपूर्ण तो नहीं है , 15 दिवस के भीतर या 42 दिन के भीतर उसका निराकरण हुआ है या नहीं , यदि कहीं भी कुछ भी गलत है तो संबंधित पुलिस अधिकारीयों को तुरंत सेवा से बर्खास्त करना चाहिये । 
पुलिस अधीक्षक से की गयी शिकायत धारा 154(3) के तहत एफ आई आर होती है , इससे ऊपर धारा 36 में शिकायत की जाती है , धारा 154(3) और धारा 36 में किसी भी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को थाना के भारसाधक अधिकारी (पुलिस स्टेशन इंचार्ज ) की सभी शक्तियां प्राप्त होतीं हैं , और वह खुद एफ आई आर दर्ज करने से लेकर वह सभी काम कर सकता है जो एक टी आई करता है , इसी शक्ति के प्रयोग के लिये ही धारा 154(3) तथा धारा 36 के आवेदन वरिष्ठ पुलिस अधिकारीयों को दिये जाते हैं , इन आवेदनों पर भी पुलिस द्वारा एफ आई आर दर्ज नहीं करने या कार्यवाही नहीं करने पर ही न्यायालय में धारा 156(3) के तहत आवेदन दिया जाता है , सुप्रीम कोर्ट तथा म प्र हाईकोर्ट खंडपीठ ग्वालियर ने धारा 156(3) के तहत न्यायालयों के लिये विस्तृत दिशा निर्देश जारी किये हैं , मसलन धारा 156(3) के आवेदन के साथ शपथ पत्र संलग्न होना चाहिये ( इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय जुलाई 2021 के अनुसार मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 156(3) के तहत पुलिस को आदेश या निर्देश देने के लिये शपथ पर आवेदक की परीक्षा आवश्यक नहीं है ) प्रथम दृष्टया अपराध के साक्ष्य व इत्तला सम्यक पाये जाने पर मजिस्ट्रेट को तुरंत ही अधिकतम 2-4 दिन में उस पर आदेश करना चाहिये , सुप्रीम कोर्ट ने तथा हाई कोर्ट ने , एक प्रकरण में इस दो चार दिन का अर्थ 6-7-8 महीने नहीं है ऐसा आदेश किया है और कहा है कि दो चार दिन का अर्थ केवल दो चार दिन ही है , सकीरी वासु मामले में यह दो चार दिन की अवधि सुप्रीम कोर्ट ने रूलिंग ला की व्यवस्था दी है , दो चार दिन से अधिक अवधि होने या धारा 156(3) में मजिस्ट्रेट द्वारा प्रतिवेदन और/या  केस स्टेटस रिपोर्ट नहीं मंगाने पर या पुलिस को आदेश या निर्देश नहीं देने पर , आवेदक तुरंत उसी वक्त से हाईकोर्ट में धारा 482 के तहत आवेदन पेश करने और उस पर हाईकोर्ट का आदेश प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है और वह याचिका अंतर्गत धारा 482 के तहत एफ आई आर दर्ज करने का आदेश प्राप्त करेगा , धारा 156(3) अगर मजिस्ट्रेट प्रतिवेदन तलब करता है तो इसका अर्थ होता है कि मजिस्ट्रेट मामले मे पुलिस से गहरी छानबीन और अन्वेषण चाहता है , यह पुलिस के लिये एक वार्निंग अलार्म होता है , इसका अर्थ है कि मजिस्ट्रेट केस में संज्ञान लेने से पहले पुलिस से साक्ष्य संग्रह और गहन अन्वेषण कराना चाहता है , इसमें सबसे पहले तुरंत ही पुलिस को प्रकरण की एफ आई आर दर्ज करना चाहिये और इसमें पुलिस के इस तर्क या किंतु परंतु को मान्य नहीं किया जायेगा कि मजिस्ट्रेट ने क्वालिटी ऑफ इन्वेस्टीगेशन के बारे मे आदेश नहीं दिया था या एफ आई आर दर्ज करने का आदेश नहीं दिया था , सुप्रीम कोर्ट और ग्वालियर हाईकोर्ट ने इसमें आगे कहा है कि मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 156(3) में प्रतिवेदन तलब करने का अर्थ व्यापक और समग्र है , उसमें उसे अन्य किसी भी प्रकार का आदेश देने की आवश्यकता नहीं है , पुलिस को एफ आई आर दर्ज कर धारा 173 के तहत ही इसमें अपना प्रतिवेदन पेश करना चाहिये , जिस वक्त भी पुलिस को कोई आवेदन प्राप्त होता है और जैसे ही वह थाने की जनरल डायरी में एंट्री किया जाता है ( भले ही वह‌ धारा 156(3) के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस को दिया गया हो ) उसी वक्त से ही पुलिस इन्वेस्टीगेशन प्रारंभ हो जाता है और यह इन्वेस्टीगेशन केवल तभी समाप्त होता है जब पुलिस द्वारा धारा 173 के तहत अपना प्रतिवेदन न्यायालय में दाखिल किया जाता है । 
इस सबके बाद भी यदि मजिस्ट्रेट यदि प्रतिवेदन पुलिस से तलब नहीं करता है या एफ आई आर दर्ज करने या क्वालिटी ऑफ इन्वेस्टीगेशन का न्यायालय की निगरानी में विवेचना का या डेली केस स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का आदेश नहीं देता है तो फिर यह मामला हाईकोर्ट में धारा 482 की याचिका का बन जाता है और तब हाईकोर्ट मामले में एफ आई आर खुद एस पी को दर्ज करने , खुद इन्वेस्टीगेशन करने और खुद ही न्यायालय मे रिपोर्ट (प्रतिवेदन ) अंतर्गत धारा 173  पेश करने का आदेश देता हैं , हाईकोर्ट में इसमें केवल यह देखा जाता है कि धारा 154, 154(3), 36, और 156(3) का आवेदक याचिका कर्ता द्वारा किया गया है या नहीं , और यदि प्रसिद्ध ललिता कुमारी बनाम उ प्र राज्य में दिये गये सुप्रीमकोर्ट के दिशा निर्देशानुसार यह सभी चरण आवेदक याचिकाकर्ता पूरे करके आया है तो हाई कोर्ट इसमें आदेश जारी कर देगा  , इसके साथ ही पुलिस अधिकारीयों पर एफ आई आर , विभागीय जांच तथा सेवा से बर्खास्तगी की कार्यवाही भी शुरू हो जाती है । 

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