जाटव समाज का इतिहास, जाटव यदुवंशी है ।
 जाटव समाज का इतिहास पढ़ें।

जाटव यदुवंशी है 
 
वर्तमान काल में जो जाटव वंश भारत के उत्तरी प्रांतो में अत्यंत प्रसिद्ध है संयुक्त, दिल्ली, पंजाब, राजस्थान, उदयपुर, अजमेर, मेवाड़, मध्य भारत, कोटा, मालवा, नीमच, उज्जैन, ग्वालियर, भरतपुर, धौलपुर आगरा, आदि में जाटव प्रधानता रहते हैं इन प्रान्तो तथा रियासतों में भी वे कुछ विशेष जिलो में ही रहते हैं संयुक्त प्रांत में जाटव मेरठ आगरा और इलाहाबाद कश्मीरियों में ही अधिकांश पाए जाते हैं पूर्वी जिलों में इनकी संख्या बहुत ही कम हैं इनमें ऐसे ही लोग मिलेंगे जो पश्चिमी जिलों में किसी कार्य बस गए और बस गए दिल्ली अजमेर पंजाब ग्वालियर उज्जैन इंदौर कोटा उदयपुर तथा भरतपुर आदि में वर्तमान काल में जो जाटव रहते हैं वे अधिकांश में संयुक्त प्रांत की पश्चिमी जिलों के गए हुए हैं इनका पूर्व निवास स्थान इसी प्रांत में है संयुक्त प्रांत में भी सबसे अधिक संख्या में जाटव ब्रजभूमि तथा उनके निकटवर्ती प्रदेशों में ही रहते हैं महाभारत युग में मथुरा यदुवंशियों की राजधानी रही और उसके बाद भी मथुरा यादवों की प्रधान नगरी रही है इस कारण भी जाटव की अधिक संख्या ब्रज में हैं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है जो लोग जाटव के इतिहास से जानकारी नहीं रखते तथा उन्हें उनका यथोचित दंड से अध्ययन नहीं किया है वह यह समझते हैं कि जाट एक नया नाम है जो 1 पिछड़ी जाति ने उनकी सभा ने अपने सुधार के लिए रख लिया है और आश्चर्य तो यह बात का है कि जाटों में भी दुर्भाग्य से ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो अपने वंश के इतिहास से सब सर्वथा अज्ञान अनभिज्ञ है वास्तव में सत्य तो यह है कि जाटव नाम बहुत प्राचीन है जैसा कि हमने यह युद्ध और युद्ध वंश का विनाश नामक अध्ययन में यह मत प्रकट किया है कि जब यादों का पतन होने लगा तब बहुत संभव है अन्य ब्राह्मण आदि जातियों ने उन्हें और भी पदक क्रांत करने का प्रयत्न किया हो और अपने वंश की रक्षा के लिए अपना नाम बदल लिया हो भाषा विज्ञान की दृष्टि से भी एक बात विचारणीय हैं और वह यह कि महाभारत और इसके बाद कई शताब्दियों तक भारत की भाषा संस्कृति रही सब लोगों संस्कृत में भाषण करते थे इसके बाद संस्कृत भाषा का जब प्रयोग कम होने लगा तब अपभ्रंश भाषाओं का प्रचार हुआ इस भाषा में संस्कृत के शब्दों के रूप में परिवर्तन कर दिया गया इस प्रकार भाषा विज्ञान की दृष्टि से यदुवंशियों ने जादव और जाटव नामों का ग्रहण किया जो कुछ भी कारण हो यह तो अब प्रमाणित हो चुका है कि जाटव और जादव दोनों प्राचीन शब्द हैं इसका प्रचार महाभारत के बाद हुआ।

शेष भाग  
पंचमहलकेसरी अखबार में
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